संसद की सलाहकार एजेंसी ने कहा- कश्मीर पर भारत के फैसले के खिलाफ पाकिस्तान के पास सीमित विकल्प



वॉशिंगटन. भारत के जम्मू-कश्मीर पर लिए गए फैसले के खिलाफ अब पाकिस्तान के पास काफी सीमित विकल्प बचे हैं। यह कहना है अमेरिकी संसद को विदेश से जुड़े मामलों में अहम जानकारी मुहैया कराने वाले थिंक टैंक कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (सीआरएस) का। एजेंसी ने बुधवार को कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के 6 महीने के अंदर ही अपनी दूसरी रिपोर्ट पेश कर दी। इसमें कहा गया है कि पाकिस्तान में सैन्य कार्रवाई के जरिए कश्मीर की यथास्थिति बदलने की ताकत नहीं है। यानी इस्लामाबाद को आने वाले समय में सिर्फ कूटनीतिक जरियों पर ही भरोसा करना पड़ेगा।

सीआरएस अमेरिकी कांग्रेस की स्वतंत्र रिसर्च विंग है। यह एजेंसी अमेरिकी सांसदों के लिए समय-समय पर रिपोर्ट्स तैयार करती है, ताकि संसद अंतरराष्ट्रीय मामलों पर फैसले ले सके। इससे पहले सीआरएस ने 13 जनवरी को भी रिपोर्ट पेश की थी। इसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ चुका है। सिर्फ तुर्की ही उसे मजबूत समर्थन मुहैया करा रहा है।

कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता कम
कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस ने 25 पन्नों की रिपोर्ट में कहा है कि पाकिस्तान ने चीन के समर्थन से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के सत्र में कश्मीर पर चर्चा की मांग की थी। यूएनएससी ने 16 अगस्त को लगभग 50 साल बाद कश्मीर मुद्दे पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई। हालांकि, यह बैठक बेनतीजा रही। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की विश्वसनीयता काफी कम है। इसकी एक वजह यह है कि इस्लामाबाद ने बीते सालों में कश्मीर में आतंकी संगठनों को बढ़ावा दिया। हालांकि, अब पाकिस्तानी नेताओं के पास कश्मीर में भारत की कार्रवाई के खिलाफ सीमित विकल्प हैं, इसके अलावा कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन की उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

पाकिस्तान की आखिरी उम्मीद- नीतियों से खुद को ही नुकसान पहुंचा ले भारत

एजेंसी ने आगे कहा, “पाकिस्तान और उसके साथी चीन की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता काफी सीमित है। खासकर मानवाधिकार के मामलों पर। हालांकि, इस्लामाबाद यह उम्मीद कर सकता है कि नई दिल्ली अपनी नीतियों के जरिए कश्मीर में खुद को ही नुकसान पहुंचा सकता है। पाकिस्तान अब यह सोच सकता है कि इससे सऊदी अरब और यूएई में भारत के कूटनीतिक फायदे कम होंगे।”

अमेरिका का पक्ष- भारत-पाकिस्तान बातचीत से निपटाएं मतभेद
सीआरएस के मुताबिक, अमेरिका का लंबे समय से पक्ष रहा है कि भारत और पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे पर मतभेद को खुद बातचीत के जरिए सुलझाएं। ट्रम्प प्रशासन ने भी दोनों देशों से मानवाधिकार के सम्मान और शांति स्थापित करने पर जोर दिया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रम्प ने जुलाई में इमरान के साथ बैठक में कश्मीर पर मध्यस्थता की बात की थी, इसकी वजह से ही भारत ने राज्य से अनुच्छेद 370 हटाने की जल्दी की।

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान यूएन में कश्मीर मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय बनाने में असफल रह चुके हैं। (फाइल)